जीवनी हज़रत बाबा अलबैले शाह यूसुफ़ी रहमतुल्लाह अलैहि

Last Updated October 25, 2025

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श्रद्धापूर्ण सलाम: “आक़ायी व मौलायी, सय्यदी व मुरशिदी, अबुल-अरवाह, ताजुल औलिया, ग़ौस-ए-ज़मान-ओ-मकान, क़ुत्ब-ए-मदार-ए-इरफ़ान, हज़रत बाबा अलबैले शाह यूसुफ़ी रहमतुल्लाह अलैहि।” (“मेरे आका और नेता, मेरे स्वामी और मार्गदर्शक, मेरी रूह के पिता, औलिया का ताज, समय और स्थान से परे मददगार, इरफ़ान के केंद्र, हज़रत बाबा अलबैले शाह यूसुफ़ी रहमतुल्लाह अलैहि।”)

प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि

हज़रत बाबा अलबैले शाह यूसुफ़ी (रहमतुल्लाह अलैहि), जिन्हें सिलसिला के अंदर सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) के नाम से जाना जाता है, का जन्म नाम कुँवर असगर अली ख़ान था। उनके पिता, कुँवर मासूम अली ख़ान, वारसी सूफ़ी सिलसिले के मुरीद थे, जिससे यह स्पष्ट है कि तसव्वुफ़ की ख़ुशबू उनके अपने सफ़र से पहले ही घर तक पहुँच चुकी थी।

इसके बावजूद, युवा कुँवर असगर अली ख़ान (बाद में सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि)) के मन में आम तौर पर सूफ़ियों के बारे में संदेह और पूर्वधारणाएँ थीं। हज़रत ग़ौस मुहम्मद बाबा यूसुफ़ शाह ताजी (रहमतुल्लाह अलैहि) से शुरुआती मुलाक़ातों में उनका दिल नहीं जुड़ा। तुरंत आकर्षण के बजाय, उन्हें प्रतिरोध और दूरी महसूस हुई।

लेकिन अल्लाह का फ़ैसला कारगर था। एक सवेरे की ख़ामोशी में उन्होंने अपने शेख़ को क़ुरआन की तिलावत करते सुना। वह लहजा दिल को चीर जाने वाला था; वैसा उन्होंने पहले कभी नहीं सुना। बाद में उन्होंने कहा कि शायद इसी तरह रसूलुल्लाह ﷺ ने जिब्रील (अलैहिस्सलाम) से क़ुरआन सुना होगा।

उसी पल से संदेह के परदे उठ गए। उनके दिल में मोहब्बत और हैरत की लहरें उमड़ने लगीं, और समय के साथ यह और गहरी होती गईं। यही वह निर्णायक मोड़ था — जिसने कुँवर असगर अली ख़ान को सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) बना दिया, एक ऐसे वली जिनका जीवन उनके शेख़ और तसव्वुफ़ की राह से अटूट हो गया।

तसव्वुफ़ की ओर रुझान

फज्र के वक़्त क़ुरआन की तिलावत से दिल खुलने के बाद, हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) और शागिर्द के बीच का बंधन तेज़ी से गहराने लगा। जो सफ़र शक से शुरू हुआ था, वह मोहब्बत में बदला और मोहब्बत गहरे लगाव में ढल गई।

आने वाले दिनों और हफ़्तों में, सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) अपने शेख़ के प्रति मोहब्बत और ताल्लुक़ की लहरों से अभिभूत रहने लगे। यह तीव्रता उन्हें अक्सर हालत-ए-इस्तिग़राक़ (आध्यात्मिक डूबाव) में ले जाती, जहाँ वे आस-पास से बेख़बर हो जाते। पहले तो हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) को इसकी शिद्दत पर चिंता हुई, फिर उन्होंने दूसरे मुरीदों को हिदायत दी कि जब ऐसी हालत आए तो उन्हें अँधेरे तहख़ाने में बेड़ियों से बाँधकर रोका जाए, ताकि यह कैफ़ियत जिस्म पर भारी न पड़े।

इसी दौर का एक वाक़या शागिर्द की तड़प और शेख़ की तर्बियत को दर्शाता है। सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) एक बार नागपुर जाकर हज़रत बाबा ताजुद्दीन (रहमतुल्लाह अलैहि) के मज़ार पर हाज़िरी देना चाहते थे। उन्होंने अपने शेख़ से उनकी करामात की दास्तानें बार-बार सुनी थीं, जो इतनी पुरअसर थीं कि सुनने वाले ख़ुद को उन्हीं मंज़रों में महसूस करते। प्रेरित होकर उन्होंने इजाज़त चाही।

दूसरे मुरीदों को तो इजाज़त मिल गई, लेकिन सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) से शेख़ ने अलग अंदाज़ में फ़रमाया:

“असगर, तुम्हें नागपुर क्यों जाना है?
बल्कि नागपुर को यहीं ले आओ।”

टिकट खरीदा जा चुका था, इसलिए वे चुप रहे। शेख़ ने फ़रमाया, “अपना टिकट किसी पीर-भाई को दे दो ताकि ज़ाया न हो।” वह मुरीद नागपुर पहुँचा, लेकिन वहाँ पहुँचते ही कई दिनों तक जज़्ब (राप्त/रैप्चर) की हालत में रहा और वहीं उसका इन्तिक़ाल हो गया।

इस से सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) समझ गए कि शेख़ उन्हें बाहरी सफ़र से बढ़कर अंदरूनी हाज़िरी सिखा रहे हैं — कि असली नागपुर दिल में मोहब्बत और निस्बत के ज़रिए लाया जाता है; ठहराव, वफ़ादारी और हाज़िरी में।

भक्ति में वृद्धि और आध्यात्मिक अवस्थाएँ

हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) के प्रति सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) की मोहब्बत साधारण न रही। वह तरंगों की तरह बढ़ी और उन्हें बार-बार हालत-ए-इस्तिग़राक़ — याद और मोहब्बत में पूरी डूब — में ले जाती, जहाँ समय, जगह और ख़ुद का शऊर मिट जाता। पहले शेख़ ने इसकी सख़्ती पर चिंता की; फिर बदन को संभालने के लिए वही बेड़ियों और तहख़ाने वाला एहतियाती तरीका जारी रखा — जलती मुहब्बत की लौ को जिस्म पर भारी पड़ने से बचाने की तदबीर की तरह।

बाद में शेख़ ने उनके सफ़र को संतुलित करने के लिए उन्हें एक और निस्बत से जोड़ दिया — हज़रत सूफ़ी अब्दुर-रहमान शाह साहिब (रहमतुल्लाह अलैहि) की निस्बत, जो सकून और स्थिरता के लिए मशहूर है। हिकमत यह थी कि हज़रत बाबा ताजुद्दीन (रहमतुल्लाह अलैहि) से बहने वाली ताजी निस्बत का जज़्बा सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) के इस्तिग़राक़ को बहुत बढ़ा देता था; इसलिए अब्दुर-रहमानिया निस्बत की ठहराव भरी रौशनी के साथ उसे संतुलित करना ज़रूरी था।

एक दिन हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) उन्हें हज़रत सूफ़ी अब्दुल हकीम शाह साहिब (रहमतुल्लाह अलैहि) के छोटे से मज़ार पर ले गए — जो हज़रत सूफ़ी अब्दुर-रहमान शाह साहिब (रहमतुल्लाह अलैहि) की सिलसिले में थे। कमरे में दो क़ब्रें थीं। सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) ने पूछा कि कौन-सी किसकी है? शेख़ ने इशारा करके फ़रमाया: “यह तुम्हारे दादा पीर साहिब हैं।” उसी पल उन्हें मालूम हुआ कि शेख़ उन्हें अब्दुर-रहमानिया निस्बत से मज़बूती से जोड़ रहे हैं — हज़रत सूफ़ी अब्दुल हकीम शाह साहिब (रहमतुल्लाह अलैहि) की विरासत के ज़रिए।

यह उनकी तशकील का अहम पड़ाव था। शेख़ हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) के प्रति मोहब्बत उनकी ज़िंदगी का मरकज़ रही, लेकिन इसके साथ एक और बरकत की धारा जुड़ गई। ताजी निस्बत और अब्दुर-रहमानिया निस्बत — इन दोनों का संगम उनकी रूहानी पहचान की पहचान बन गया।

ख़िलाफ़त और नेतृत्व

आख़िरकार हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) ने सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) को ख़िलाफ़त से नवाज़ा और उन्हें अपना जाँ-नशीन (उत्तराधिकारी) मुकर्रर किया — यह सिर्फ़ औपचारिक इजाज़त नहीं थी, बल्कि इस बात का इकरार कि वे शेख़ की निस्बत को पाकीज़गी से सँभालने के क़ाबिल हो गए थे।

उनकी ख़िलाफ़त की ख़ास बात उसका एहतियात और संकोच था। पूरी इजाज़त होने के बावजूद, उन्होंने केवल एक शख़्स को बैअ‘त में लिया — अपने उत्तराधिकारी हज़रत बाबा शाह महमूद यूसुफ़ी (रहमतुल्लाह अलैहि) को। यह जानबूझकर किया गया फ़ैसला था: तसव्वुफ़ भीड़ नहीं, बल्कि शेख़ और मुरीद के दरमियान अस्ल रिश्ते की हिफ़ाज़त है।

कराची उनकी ख़िदमत का मरकज़ बना — उनके अपने चुनाव से नहीं, बल्कि शेख़ की मर्ज़ी से। हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) आख़िरी दिनों में वहाँ आए और थोड़े ही अर्से में उनका इन्तिक़ाल हो गया। सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) ने शेख़ की वसीयत के मुताबिक़ उनके मुबारक जिस्म को कराची में दफ़्न कराया।

दफ़्न के शुरुआती हफ़्तों में देखभाल की ज़िम्मेदारी सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) और उनके पीर-भाई हज़रत राहत सईद चिश्त्ती (रहमतुल्लाह अलैहि) पर आ गई। दोनों शहर में नए थे। जैसे-जैसे ख़बर फैली, दूसरे शहरों से पीर-भाई अपने अहल-ए-ख़ाना के साथ आने लगे। कम सहूलियत के बावजूद, सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) ने अपना घर खोल दिया — कभी-कभी बीस से ज़्यादा ख़ानदान एक साथ ठहरते। कुछ ही समय में हज़रत ज़हीन शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) भी कराची आ गए और शहर यूसूफ़ी सिलसिले का नया दिल बन गया।

अपने शेख़ की तरह लम्बे बयानात देने के बजाय, सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) का अंदाज़ ख़ामोश, वक़ार-भरा और नफ़्सी (व्यक्तिगत) था। वे कम बोलते, मगर वज़न से। अक्सर हज़रत बाबा शाह महमूद यूसुफ़ी (रहमतुल्लाह अलैहि) के मुरीद फ़ातिहा के बाद उनके घर जमा होते और उन मौकों पर वे कुछ हिदायतें देते — ज़्यादातर अपने शेख़ हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) के ज़िक्र पर। उनकी बयानी ताक़त उनके अल्फ़ाज़ की लंबाई में नहीं, बल्कि ख़ामोशी की गहराई और भरोसे में थी।

तालीमात, ख़ुसूसियात और खिदमात

सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) की रूहानियत की बुनियाद क़ुरआन थी। उनकी अपनी इनक़िलाबी कैफ़ियत तब शुरू हुई जब उन्होंने फज्र में अपने शेख़, हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि), की तिलावत सुनी। वह सदा — जिसे उन्होंने यूँ बयान किया कि शायद इसी तरह रसूलुल्लाह ﷺ ने जिब्रील (अलैहिस्सलाम) से सुना — उनके अंदर की दुनिया का मरकज़ बन गई। वे तालीम में अक्सर क़ुरआन की तरफ़ लौटते, लंबी तफसीरों से नहीं, बल्कि यह दिखाने के लिए कि असली रोशनी एक सच्चे शेख़ के अमल से सबसे साफ़ झलकती है।

अपने शेख़ की तरह उन्होंने फ़क़्र (अल्लाह पर पूर्ण निर्भरता) को जिया। दुनियावी वज़ीफ़ों, सरपरस्ती या किसी पर टिके रहना उन्होंने छोड़ दिया। उनकी क़ुव्वत तवक्कुल से आती थी — अल्लाह की रिज़्क़ पर भरोसा। यह बात कराची के शुरुआती दिनों में बेहद साफ़ दिखी, जब उन्होंने अपनी तंग वुसअत के बावजूद बीस से ज़्यादा पीर-भाइयों के ख़ानदानों की मेज़बानी की। एक फ़क़ीर की दौलत माल-असबाब में नहीं, बल्कि दिव्य इरादे के आगे सरेंडर में होती है — उनकी ज़िंदगी इसका सबूत बनी।

उनकी सार्वजनिक नसीहतें अधिकतर उनके शेख़ हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) के जीवन के इर्द-गिर्द रहीं। वे तसव्वुफ़ के मज़ामीन और क़ुरआनी इशारों की तशरीह भी करते, लेकिन दिल हमेशा शेख़ की कहानियों की तरफ़ लौटता — करामात, हिकमत, रहमत। ये यादें महज़ दास्तान नहीं थीं, बल्कि मुहब्बत की ज़िंदा तरसील — जो सुनने वाले को हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) की हाज़िरी में पहुँचा देतीं, जैसे वे ख़ुद कभी क़ुरआन सुनकर पहुँचे थे।

अपनी गहरी इस्तिग़राक़ की कैफ़ियतों के कारण, शेख़ ने उन्हें हज़रत सूफ़ी अब्दुर-रहमान शाह साहिब (रहमतुल्लाह अलैहि) की निस्बत से भी जोड़ा — जो तवाज़ुन देती है। यह राब्ता सबसे साफ़ तब ज़ाहिर हुआ जब शेख़ उन्हें हज़रत सूफ़ी अब्दुल हकीम शाह साहिब (रहमतुल्लाह अलैहि) के मज़ार पर ले गए और उन्हें “दादा पीर” बताया — यूँ उनकी विरासत में ताजी निस्बत और अब्दुर-रहमानिया निस्बत दोनों का संगम पुख्ता हुआ।

Divine Light of the Most Merciful - انوارالرحمٰن

सन १९९२ में उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण इल्मी खिदमतों में से एक अंजाम दी: पुरानी फ़ारसी तज़किरा अनवार-उर-रहमान, अल-तनवीर-उल-जिनान का ख़ुलासा — जिसमें हज़रत सूफ़ी अब्दुर-रहमान शाह साहिब (रहमतुल्लाह अलैहि) की ज़िंदगी का बयान था। इसे आसान उर्दू में लाकर उन्होंने अपने ज़माने के तालिब-ए-हक़ के लिए इसकी रौशनी दस्तयाब कर दी। यह शाया शुदा काम, अनवार-उर-रहमान (क्लिक कर डाउनलोड करें), उनकी उस अमानत-ए-रूहानी की हिफ़ाज़त का सुबूत है जो उन्हें सौंपी गई थी। ज़िंदगी के आख़िरी वर्षों, ख़ासकर शुरुआती १९९० के दशक में, वे धूप में बैठकर अस्मा-उल-हुस्ना (अल्लाह के ख़ूबसूरत नाम) अपने हाथ से लंबे वक़्त तक लिखा करते — सैकड़ों सफ़्हे। यह ज़िक्र भी था और मुजाहदा भी — याद में स्थिरता और दिव्य इरादे के आगे सरेंडर का ज़ाहिर निशान।

Sarkar Namah: Masters Book Tablet View

उनकी सबसे मशहूर तहरीर सरकार-नामा (क्लिक कर डाउनलोड करें) है — सादा ज़बान में बोल-बोलकर लिखवाई गई किताब, ज्यों-का-त्यों उतराई। इसमें हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) की ज़िंदगी और करामात दर्ज हैं। यह सिर्फ़ तज़किरा नहीं — एक मुरीद का ख़त-ए-मोहब्बत है, ताकि शेख़ की ख़ुशबू क़यामत तक महकती रहे। सरकार-नामा (क्लिक कर डाउनलोड करें) उनकी विरासत का सिर्फ़ एक हिस्सा है, मगर यह उनके दिल और अमानत की खिड़की बना रहता है।

कई शेख़ जहाँ बड़े इज्तिमा‘ओं में लम्बे बयान करते हैं, वहाँ सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) ने ख़ामोशी और इख़्तिसार को पसंद किया। उनके अल्फ़ाज़ कम, मगर सच्चाई और तास्सुर से भरे होते। अक्सर हज़रत बाबा शाह महमूद यूसुफ़ी (रहमतुल्लाह अलैहि) के मुरीद फ़ातिहा के बाद उनके घर जमा होते और ऐसे निजी माहौल में वे बात करते — हमेशा अपने शेख़ के ज़िक्र पर। उनकी पेशवाई उनकी मौजूदगी और अमानत में झलकती थी।

विरासत और इन्तिक़ाल

सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) ने वादा किया था कि रुख़्सत से पहले वे हज़रत बाबा शाह महमूद यूसुफ़ी (रहमतुल्लाह अलैहि) से मुलाक़ात करेंगे। एक सुबह, शुरुआती १९९० के दशक में, जब हज़रत बाबा शाह महमूद यूसुफ़ी (रहमतुल्लाह अलैहि) मुनरो, न्यूयॉर्क में थे, वे शेख़ की मौजूदगी से नींद से जागे — शेख़ ने बजती टेलीफ़ोन की तरफ़ इशारा किया। रिसीवर उठाया तो कराची से सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) की आवाज़ थी, जो ग़ज़ल के शे‘र से शुरू हुई: “लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में।” यह जज़्बाती विदा थी। उन्होंने इजाज़त चाही कि वे आएँ, मगर शेख़ ने ताकीद की कि फिलहाल अमरीका में ही रहें। यूँ, शेख़ ने वादा पूरा किया — हाज़िरी और मोहब्बत से “मुलाक़ात” कर ली।

वे अक्सर कहते, “जब मेरा शेख़ लेने आएगा, मैं लेटा हुआ नहीं जाऊँगा।” सोमवार, २१ नवंबर १९९४ (१६ जुमादुस्सानी १४१५ हि.) को यह बात सच्ची हो गई। बीमार होने के बावजूद, उन्होंने दरख़्वास्त की कि उन्हें बैठा दिया जाए। उसी हल्क़े बैठे हुए अंदाज़ में — होशमंद, मुतमऐन, शेख़ की आने वाली हाज़िरी का इंतज़ार करते — सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) अपने रब के पास रुजूअ कर गए।

वे एक ऐसे वली के तौर पर याद किए जाते हैं जो ताजी निस्बत (हज़रत यूसुफ़ शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैहि) से) और अब्दुर-रहमानिया निस्बत (हज़रत सूफ़ी अब्दुर-रहमान शाह साहिब (रहमतुल्लाह अलैहि) और हज़रत सूफ़ी अब्दुल हकीम शाह साहिब (रहमतुल्लाह अलैहि) के ज़रिए) — दोनों के वारिस थे। उन्होंने ख़िलाफ़त सिर्फ़ हज़रत बाबा शाह महमूद यूसुफ़ी (रहमतुल्लाह अलैहि) को देकर सिलसिले को पाकीज़गी और वफ़ादारी से महफ़ूज़ रखा।

उनकी तहरीरें — जैसे सरकार-नामा (क्लिक कर डाउनलोड करें) और अनवार-उर-रहमान (क्लिक कर डाउनलोड करें) — और उनका निरंतर अस्मा-उल-हुस्ना का ज़िक्र, उनकी मुहब्बत की निशानियाँ हैं। लेकिन किसी भी तहरीर से बढ़कर उनकी अपनी ज़िंदगी उनकी तालीम थी — इन्क़िसार, वफ़ादारी, और शेख़ से मोहब्बत।

कराची — जिसे शेख़ ने अपनी आख़िरी आरामगाह बनाया — वही शहर सरकार आ‘ला हज़रत (रहमतुल्लाह अलैहि) के हाथों सिलसिले की अमानत का मरकज़ बना। उनकी विरासत आज भी यूसूफ़ी राह को सादगी, ख़ामोशी और सच्चाई से रौशन करती है।

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