हज़रत बाबा ग़ौस मुहम्मद यूसुफ़ शाह ताज़ी रहमतुल्लाह अलैहि की जीवनी

Last Updated October 25, 2025

Baba Ghous Muhammad Yousuf Shah Taji

सम्मानसूचक उपाधियाँ: “मज़हर-ए-कुल अव्वलीन वल आखिरिन, ताजुल मुहब्बीन वल महबूबीन, फख़र-उल-अश्शाक़ वल-मुवह्हिदीन, ग़ौसिना, ग़यासिना, मुगीसिना, आका-ए-ना, सैय्यद-ए-ना, सनद-ए-ना, मुर्शिद-ए-ना, मौला-ए-ना, अबुल-अरवाह़, ताजुल औलिया, हज़रत ग़ौस मुहम्मद बाबा यूसुफ़ शाह ताज़ी रहमतुल्लाह अलैहि। या ग़ौस, या यूसुफ़ शाह, या बाबा, अघिसनी वा अम्दिदनी।” (अर्थात् – प्रथम और अंतिम सब हक़ीक़तों के पूर्ण प्रतिबिंब, प्रेमियों और प्रियजनों के ताज, इश्क़ और तौहीद वालों का गर्व, हमारे मददगार, सहायक, सहारा, आका, नेता, भरोसा, मार्गदर्शक, मौला, आत्माओं के पिता, औलिया का ताज – हज़रत ग़ौस मुहम्मद बाबा यूसुफ़ शाह ताज़ी रहमतुल्लाह अलैहि। ऐ ग़ौस! ऐ यूसुफ़ शाह! ऐ बाबा! मेरी सहायता और मदद फरमाइए।)

प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि

सरकार रहमतुल्लाह अलैहि का मुबारक नाम हज़रत मौलाना मुहम्मद अब्दुल करीम शाह था, और लोगों में वे सैय्यद बाबा ग़ौस मुहम्मद यूसुफ़ शाह ताज़ी रहमतुल्लाह अलैहि के नाम से प्रसिद्ध हुए।

आपका जन्म गंगापुर, सवाई माधोपुर (जयपुर राज्य) में रमज़ान के महीने सन् १८८५ ई॰ में हुआ। कुछ ही महीनों बाद आपकी सम्मानित माता का देहांत हो गया और आपका पालन-पोषण आपके आदरणीय पिता सैय्यद लाल मुहम्मद शाह रहमतुल्लाह अलैहि ने किया। आपने प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय मकतब में प्राप्त की, जहाँ आपने पवित्र क़ुरआन और फ़ारसी की मूल बातें सीखीं। परिवार का जीवन अल्लाह सुब्हानहु व तआला पर पूर्ण भरोसे से चलता था, परंतु ज्ञान के प्रति आपकी प्रबल लगन आपको उच्च शिक्षा के लिए बरेली शरीफ़ ले गई।

विशिष्ट पगड़ी और हज़रत नन्हे मियाँ रहमतुल्लाह अलैहि की दुआ

बरेली में, आला हज़रत मौलाना अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी रहमतुल्लाह अलैहि के मदरसे में, आपने बारह वर्षों तक फ़िक़्ह, हदीस और मंतिक (तर्कशास्त्र) में असाधारण दक्षता प्राप्त की, और दर्स-ए-निज़ामी का पूरा पाठ्यक्रम पूरा किया।

फिर विद्वानों की सलाह पर आपने अपने प्रमाणपत्र सीतापुर के उलमा से सत्यापित कराए, जिन्होंने आपको ज्ञान के मानदंडों पर परखा और प्रसन्नतापूर्वक उनकी पुष्टि की। इसी दौरान आपके उपदेश और मार्गदर्शन के क्षेत्र में आपका सम्मान और प्रभाव बढ़ने लगा। आपका वस्त्र और व्यक्तित्व उस युग के विद्वानों और दाइयों की गरिमा के अनुरूप था—“माथे पर आगे की ओर बढ़े हुए बाल… लंबा मलमल का कुर्ता… हरी पगड़ी… जेब में चेन से लगी घड़ी वाला वास्कट… धूप का चश्मा… चाँदी की अँगूठी… और हाथ में छड़ी”—यह एक धर्म प्रचारक की दैनिक जीवन-शैली थी, और लोग आपको प्रेमपूर्वक उपहार भी दिया करते थे।

प्रमाणपत्र वितरण समारोह में हज़रत सिराज-उल-सालिकीन शाह निज़ामुद्दीन रहमतुल्लाह अलैहि (जो नन्हे मियाँ रहमतुल्लाह अलैहि के नाम से प्रसिद्ध थे) अध्यक्ष थे। उन्होंने सरकार रहमतुल्लाह अलैहि को मंच पर बिठाया और उनसे पवित्र क़ुरआन की तिलावत करने और नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत पर भाषण देने को कहा। उस रूहानी माहौल और विशेष निगाह के असर में आप पर वज्द और इस्तिग़राक़ की अवस्था छा गई। जब आप आदरपूर्वक कदमबोसी के लिए झुके, तो हज़रत नन्हे मियाँ रहमतुल्लाह अलैहि ने अपना मुबारक पाँव उनके कंधों पर रखकर फरमाया: “जाओ, मिलाद-उन-नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की महफ़िलें आयोजित करो और दीन का प्रचार करो।”

सरकार रहमतुल्लाह अलैहि इस घटना को प्रेम और तड़प के साथ बयान करते थे: “हज़रत सिराज-उल-सालिकीन के मुबारक पाँव का वह असर मेरे उपदेश में ऐसा समा गया कि अब लोग दूर-दूर से मेरे बयान सुनने आते हैं।”

उसी समय भारत के विभिन्न प्रांतों—नागपुर, अहमदाबाद, गुजरात, मद्रास, काठियावाड़, बंबई, जूनागढ़ और उत्तर प्रदेश के प्रमुख नगरों में—आपके प्रवचनों को असाधारण प्रसिद्धि प्राप्त हुई। आपने कभी निश्चित पारिश्रमिक नहीं रखा; जो कुछ दिया जाता, उसे स्वीकार करते, और यदि वह अधिक प्रतीत होता तो कम राशि स्वीकार करते।

फिर भी उनके दिल में यह तड़प बनी रही कि “यदि इस धार्मिक ज्ञान में रूहानी तत्व जुड़ जाए, तो स्वभाव और भी ताज़गी पा जाए।”

यही तड़प उन्हें अजमेर शरीफ़ ले आई—एक पूर्ण शैख़ की तलाश में बैअत के लिए। “मैं ऐसे शैख़ का दामन थामूँगा जो रूहानियत के दर्जों के साथ-साथ इल्म में भी कमाल रखता हो।”

रूहानी सिलसिले में बैअत

मग़रिब की नमाज़ के बाद दरगाह शरीफ़ की मस्जिद में उनका दिल एक रौशन चेहरे वाले बुज़ुर्ग और ख़ूबसूरत वली की ओर खिंच गया, जो शेरवानी और पगड़ी में सजे हुए थे — वही थे सूफ़ी अब्दुल हकीम शाह रहमतुल्लाह अलैहि। सलाम और मुसाफ़े के बाद शैख़ ने प्यार से कहा, “आओ, चाय पीते हैं — कुछ अपनी कहो और कुछ मेरी सुनो।” उनके ख़ानक़ाह के कमरे की साफ़-सुथरी व्यवस्था और रूहानी माहौल ने एक सच्चे तलाशगर के दिल को और भी तसल्ली दी।

गुफ़्तगू के दौरान शैख़ का इल्मी नज़रिया, नर्म लहजा और क़ुरआन की गहरी समझ उन्हें बेहद प्रभावित कर गई। यह भी मालूम हुआ कि उन्हें क़ादरी, रज़्ज़ाक़ी, चिश्ती और साबरी तमाम तरीक़ों की इजाज़त और सिलसिला प्राप्त था। जब उनके अंदर की तलब और बढ़ी, तो उन्होंने बैअत की दरख़्वास्त की; शैख़ ने मुस्कराते हुए तुरंत उन्हें रूहानी सहारा दिया — “यह बैअत सन् १९१२ ई॰ में हुई।”

उन्होंने सूफ़ी साहिब रहमतुल्लाह अलैहि के दिए हुए अज़कार और अमल पूरे इरादे और स्थिरता से निभाए। कुछ ही महीनों में उन्हें ख़िलाफ़त और इजाज़त प्रदान की गई और उन्हें दावत और तालीम के काम पर नियुक्त किया गया। जहाँ पहले वे आलिम की हैसियत से उपदेश देते थे, अब लोग बड़ी संख्या में उनके हाथ पर बैअत करके तरीक़त में दाख़िल होने लगे।

कई सफल सफ़रों के बाद जब वे अपने मुर्शिद के साथ हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि की दरगाह पर हाज़िर हुए, तो उन पर रूहानी कैफ़ियत का गहरा असर हुआ और वे ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। जब उन्होंने दरगाह के मुबारक मज़ार के पास जाकर कदमबोसी की और अपना सिर वहाँ रखा, तो “मेरी टोपी सिर से गिर गई और गुम हो गई; वह फिर कभी नहीं मिली।” जब बाहर आए, तो जूते भी नज़र नहीं आए। इन घटनाओं से उन्होंने समझ लिया कि अब उनका सिर और पाँव हमेशा नंगे रहेंगे। उन्होंने लटें, पगड़ी, वास्कट, जेब की घड़ी और छड़ी सब छोड़ दी; अब उन्होंने लुंगी और लंबा कुर्ता पहनना शुरू किया — और इस तरह एक आलिम-ए-दीन का लिबास छोड़कर दरवेशी पहनावा अपनाया।

हज़रत बाबा ताजुद्दीन रहमतुल्लाह अलैहि की दरगाह में हाज़िरी और निर्णायक इशारे

उनके दिल में एक हल्का सा संकोच था: “बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि की करामात और कश्फ़ पर तो कोई शक नहीं, लेकिन वे शायद शरीअत की सीमाओं का पूरा पालन नहीं करते।” इसी विचार के साथ जब वे एक मजलिस में कदमबोसी के लिए झुके, तो बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि ने अपने मुबारक पैर पीछे खींच लिए और फ़रमाया: “मौलवी साहब यहीं रहिए, वरना झाड़ी से बाँध देंगे।”

अगले दिन एक और भीड़ में बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि ने गहरी नज़र डाली, फिर अपना मुबारक चोग़ा उतारकर ज़ोर से उनकी ओर फेंकते हुए कहा: “लो—तुम्हारी शरीअत तुम्हें मुबारक हो!” यह इस बात का इशारा था कि शरीअत और तरीक़त, दोनों की हक़ीक़त को एक साथ मिलाना ज़रूरी है।

फिर बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि ने फ़रमाया: “तुम वाकी शरीफ़ में बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि की ख़िदमत में हाज़िर हो जाओ…” सरकार यूसुफ़ शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैहि बयान करते हैं, “हमने तैयारी की और वहाँ पहुँच गए। मैंने देखा कि लोगों की बहुत बड़ी भीड़ है।”

बावड़ी में ठहराव और वज्द की दुनिया

एक दिन बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि तेज़ी से चलते हुए आए, मेरा हाथ पकड़ा और क़िले के पास स्थित एक सूखी बावड़ी के मुहाने पर ले गए। वहाँ दीवार में गुफ़ा जैसी एक दरार थी। उन्होंने मुझे उसके भीतर बिठाया और फ़रमाया:

“हज़रत (आप) यहीं रहेंगे, चाय पिएँगे और ‘अल्लाह! अल्लाह!’ का ज़िक्र करेंगे।
जब ज़रूरत हो, तब ही बावड़ी से बाहर जाना।”

उनके जाने के बाद शाम को खुदा बख़्श केवल एक प्याली चाय लेकर आए और मुझसे कहा,

बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि ने यह चाय भेजी है; इसे पी लीजिए। जब तक आप यहाँ रहेंगे, सुबह और शाम एक-एक प्याली चाय मिलेगी। अगर और चाहिए, तो जैसे ही बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि आएँ, उनसे कह दीजिए।”

बाबा ताजुद्दीन बाबा रहमतुल्लाह अलैहि की करामत से चालीस (४०) दिनों तक सिर्फ़ उन दो प्यालियों चाय पर ही ज़िंदगी गुज़री, हालाँकि शरीर कमज़ोर हो गया था।

सरकार यूसुफ़ शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैहि ज़्यादातर वक्त नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद भेजते रहते, दरूद-ए-ताज, सूरह या-सीन, सूरह अल-मुज़्ज़म्मिल, चहल काफ़, क़सीदा-ए-ग़ौसिया और मसनवी शरीफ़ की तिलावत किया करते। जब भी ज़रूरत होती, वे बावड़ी से बाहर तालाब के दूसरे किनारे जाते, वुज़ू करते और फिर लौट आते।

चालीस दिनों के बाद जब खुदा बख़्श चाय लाए, तो बोले, “आइए, बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि ने आपको बुलाया है।” मैं, सरकार यूसुफ़ शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैहि, खुदा बख़्श के साथ बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और कदमबोसी की। उस समय बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि ने फ़रमाया, “आओ, यूसुफ़!” सरकार का असली नाम अब्दुल करीम था। ऐसा प्रतीत होता है कि “यूसुफ़” की उपाधि उन्हें इसी कुएँ या बावड़ी से संबंध के कारण प्रदान की गई। उस दिन के बाद से सरकार अपना नाम मुहम्मद यूसुफ़, उर्फ़ अब्दुल करीम, लिखा करते थे।

इसी मुलाक़ात में बाबा ताजुद्दीन रहमतुल्लाह अलैहि ने अपनी नज़रे-करम से एक निर्णायक वाक्य फ़रमाया — जो आने वाले समय में उनकी रूहानी पहचान बन गया।

बाबा साहिब रहमतुल्लाह अलैहि ने यूसुफ़ शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैहि का हाथ ऊँचा उठाकर पूरी महफ़िल के सामने ऐलान किया:

“इनसे सीखो और इनके साथ रहो।
ये ताजुद्दीन रहमतुल्लाह अलैहि के ख़ज़ानों की सबसे बड़ी चाबी हैं।”

वही क्षण था जब सरकार ताजुद्दीन रहमतुल्लाह अलैहि ने अपने मुकम्मल ख़लीफ़ा की इल्मी और रूहानी विरासत का ऐलान किया।

इस तरह सरकार यूसुफ़ शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैहि को वह रूहानी मुक़ाम प्रदान हुआ जो इल्म और मआरिफ़ की कुंजी बन गया — वह बरकत जो आज भी इस सिलसिले के मुरीदों के दिलों को रौशन करती है।

दावत और प्रचार की यात्राएँ

बाबा ताजुद्दीन रहमतुल्लाह अलैहि के हुक्म से पहली यात्रा मद्रास से शुरू हुई। “लोग बड़ी तादाद में सिलसिले में दाख़िल होने लगे… यहाँ तक कि बहुत से हिंदू भी मुरीद बन गए।” कई जगहों पर आरती की रस्म अदा की जाती, माथे पर तिलक लगाया जाता और सरकार रहमतुल्लाह अलैहि को ऊँचे आसन पर बिठाया जाता — यह लोगों के दिल जीतने और धीरे-धीरे उन्हें तौहीद की हक़ीक़त से परिचित कराने का एक बुद्धिमत्तापूर्ण तरीका था।

अजमेर शरीफ़ उपमहाद्वीप का रूहानी केंद्र है; शहर और दरगाह के हर कोने में ज़िक्र और फ़िक्र के क़ाफ़िले दिखाई देते हैं। इसी पृष्ठभूमि में सरकार रहमतुल्लाह अलैहि के ताजाबाद शरीफ़ और अजमेर शरीफ़ में ठहरने और उनके जीवन की विशेषताओं को समझे बिना यह वर्णन अधूरा रहता है।

सरकार रहमतुल्लाह अलैहि के चरित्र की मिठास और उनके अंतःकरण की पाकीज़गी अनुपम थी। एक बार किसी ने उनकी जेब से रुपए निकाल लिए, और बाद में किसी और ने पूछा, “क्या वे पर्याप्त हैं?” तो उन्होंने मुस्कराकर कहा, “सरकार काफ़ी हैं।” उस व्यक्ति ने कहा, “मैं अल्लाह के बारे में नहीं, पैसों के बारे में पूछ रहा हूँ—गिनकर बताइए कितना है।” तब उन्होंने जेब से पाँच रुपए निकाले, उसे दे दिए और नर्मी से कहा, “रख लो, हम झूठ नहीं बोलते।” यह वाक्य आज भी एक सच्चे तलाशगर के दिल पर दस्तक देता है — कि रूहानियत की राह की बुनियाद सच्चाई और पाक दिल है।

सरकार रहमतुल्लाह अलैहि के विचार में धार्मिक शिक्षा में रूहानी तत्व का जुड़ना अनिवार्य था; इसलिए उन्होंने लोकप्रिय बयानबाज़ी और मिलाद की महफ़िलों से आगे बढ़कर सुलूक की ओर रुख़ किया — बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि शरीअत और तरीक़त की हक़ीक़तों का मेल। चाहे अजमेर में टोपी और जूतों का ग़ायब होना हो या बाबा ताजुद्दीन रहमतुल्लाह अलैहि के चोग़े की बरकत — हर घटना ने उन्हें दरवेशी सादगी और सतत् ज़िक्र की ओर मार्गदर्शन किया।

उनकी नातिया आवाज़ और मिलाद की महफ़िलों में बयान का असर पहले से ही प्रसिद्ध था, पर नन्हे मियाँ रहमतुल्लाह अलैहि के मुबारक कदम की बरकत से यह पूरे देश में फैल गया — “लोग दूर-दूर से मेरे बयान सुनने आते हैं।” जब राह के साधन उपलब्ध हो गए, तो बैअत करने वालों के काफ़िले बन गए।

ईमान की सेवा, मोहब्बत की दावत

सिराज-उल-सालिकीन रहमतुल्लाह अलैहि की इजाज़त के बाद मिलाद-उन-नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की महफ़िलें उनकी दावत की पहचान बन गईं। नातिया शौक़ और दिल की हाज़िरी के साथ उनकी महफ़िलों में मोहब्बत और अदब के दीये जलते रहे। उन्होंने सिखाया कि नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत और शरीअत की पाबंदी ही असली सूफ़ी रास्ते के मापदंड हैं। वे बाबा ताजुद्दीन रहमतुल्लाह अलैहि की तालीम को तरीक़त की बारीकियों की व्याख्या बताते थे — यह दिखाते हुए कि शरीअत और तरीक़त अपने-अपने दायरे में हक़ हैं और एक-दूसरे को मुकम्मल करते हैं।

अंतिम दिन, विसाल और दरगाह मुबारक

हज़रत ताजुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैहि की फ़ैज़ और सूफ़ी अब्दुल हकीम शाह रहमतुल्लाह अलैहि की तर्बियत से उनके दिल में रचा-बसा “ताज़ी और यूसुफ़ी” दोनों सिलसिलों का नूर उनके उपदेश, दावत और तालीम की रूह बन गया। वे बैअत को केवल एक रस्म नहीं बल्कि दिलों के संबंध का बंधन मानते थे; शरीअत को आधार और ज़िक्र व मोहब्बत को उसकी रूह समझते थे। इस अमानत की हिफ़ाज़त के लिए उन्होंने इजाज़त और ख़िलाफ़त के सिलसिले को संतुलन और सच्चाई से जारी रखा — उनका लक्ष्य संख्या नहीं बल्कि इख़लास की गुणवत्ता थी।

अल्लाह सुब्हानहु व तआला के घर का हज अदा करने के बाद उनकी बीमारी बढ़ने लगी। इसी दौरान सरकार रहमतुल्लाह अलैहि ने मुस्कराते हुए और प्यार भरे अंदाज़ में फ़रमाया:

“अरे, तुम लोग मेरे लिए यहाँ क़ब्र क्यों तलाश कर रहे हो?
मेरी मिट्टी इस जगह की नहीं है।
मेरा सिर पाकिस्तान में है और मेरे पाँव भी पाकिस्तान में हैं।
मुझे पाकिस्तान ले चलो!
और मेरे सभी बच्चों को लिख दो कि वे जल्द से जल्द पाकिस्तान पहुँच जाएँ।
जो देर से पहुँचेगा, वह उतना ही घाटे में रहेगा।”

संक्षेप में, सन् १९४७ ई॰ में, शव्वाल महीने के अंतिम दस दिनों में, हज़ूर और उनके कुछ मुरीद कराची पहुँचे। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई और ज़िल-क़ादा की २९वीं और ज़िल-हिज्जा की पहली रात के दरमियान, रात डेढ़ बजे, सरकार यूसुफ़ शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैहि ने “लब्बैक” (ऐ अल्लाह! मैं हाज़िर हूँ) कहते हुए इस दुनिया से रुख़्सत फ़रमा ली।

Sarkar Namah: Masters Book Tablet View

आपकी तदफीन कराची के मेवा शाह क़ब्रिस्तान में की गई। वहाँ एक शानदार दरगाह बनाई गई, जो आज खानक़ाह-ए-ताज़ी के नाम से प्रसिद्ध है। ज़िल-क़ादा की २९वीं से ज़िल-हिज्जा की २ तारीख़ तक आपका उर्स मुबारक बड़े पैमाने पर आयोजित होता है। हर गुरुवार फ़ातिहा होती है। सिलसिले के मुरीद और आशिक़ लगातार हाज़िरी देते हैं। कराची के लोग भी ज़ाहिरी और बातिनी बरकत हासिल करने के लिए आपके मुबारक मज़ार पर आते हैं। सरकार यूसुफ़ शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैहि की विस्तृत जीवनी पढ़ने के लिए, उनकी ज़िंदगी पर आधारित किताब सरकार नामाह का अध्ययन करें।

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