बाबा

Last Updated July 30, 2025

यह वह नाम है जिससे हम आमतौर पर अपने शेख और उनसे पहले आने वाले बुज़ुर्गों को पुकारते हैं। (हमारे लिए)

यह हज़रत बीबी फातिमा ज़हरा (रज़ियल्लाहु तआला अन्हा) की सुन्नत से लिया गया है, क्योंकि वह अपने सबसे मुक़द्दस पिता, हज़रत मुहम्मद मुस्तफा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को “बाबा” कहकर पुकारती थीं। यह सुन्नत उनके बच्चों में भी जारी रही। (संदर्भ)

अरबी में केवल दो रिश्तों के नाम हैं — “बाबा” (पिता) और “मामा” (माता) — जिनमें इंसान के होंठों को दोहराव में दो बार आपस में मिलाना पड़ता है। किसी भी अन्य मानव भाषा में ऐसे शब्द हमें ज्ञात नहीं हैं। यह वहदत-ए-वुजूद (अस्तित्व की एकता) का संकेत है, जैसे होंठ मिलते हैं, वैसे ही दो सज्दों की तरह जो एक रकअत में होते हैं। (गहरा सूफ़ी सन्दर्भ)

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